Friday, November 29, 2013

||| चिरागों को तूफानों के रुख कर मैंने...
यूँ ही खुद को आजमाया देर तक...
कू-ए-यार में दीद कि आस लिए इन्तहा तक रुके लेकिन,
मुसाफ़िर होना ही पड़ा जब,
वो न आया देर तक.. |||
||| तू हुस्न-ए-ज़फ़ा है, ये तेरी अदा है, मैं अहल-ए-वफ़ा हूँ, ये मेरी सदा है|
हस्र में तलब हों मेरे सब रक़ीब,
तू मेरी बन रहे तमाम उम्र यही दुआ है...
तेरे इश्क़ से बाबस्ता, मुअज़ज़म हुआ चाहता हूँ वाइज़ नहीं,
इल्म हो तुझको कि इस काफिर का तू ही ख़ुदा है |||