|||वो लम्हा याद है जब दरया समंदर हो गया,
रूबरू शाह थे और मैं कलंदर हो गया..
लफ्ज़ लड़खड़ाते थे मेरे दास्तानगोई में,
उसकी शफ़ीकी का असर था की मैं सुख़न्वर हो गया|||
रूबरू शाह थे और मैं कलंदर हो गया..
लफ्ज़ लड़खड़ाते थे मेरे दास्तानगोई में,
उसकी शफ़ीकी का असर था की मैं सुख़न्वर हो गया|||