Tuesday, November 15, 2011

Gham-e-Jindagi

||| किसी की मय्यत तड़प रही है,
    कोई शफीक-ए-खुदा हो रहा है|
    किसी के हब में है शब् का आलम 
    कोई आफ़ताब-ए-जहाँ हो रहा है |
    खबर बही जिंदगी के रुख का,
    हमारी ज़ानिब ये क्या हो रहा है|||



||| बुतपरस्ती की जो हमने तमाम उम्र
   तो मिला हमको ये सिला
   की उमर गुजर गयी ग़म काटते
   और खुशियों की आमद पे हामिद खुद बुत बन गया|||



|||ग़म-ए-जिंदगी को भुलाने जो की हमने ज़ाम की सोह्बत,
  चंद रिंद हमारे यार बने |
  फिर महफ़िलें जमी, पीने के बहाने हज़ार बने|
  रूखसत का लम्हा जो आया तो ये राज़ जाना, 
  नशा तो ग़म का ही था,
  ये ज़ाम तो बस हल्फ को मददगार बने|||




|||मुफ़लिसी के आलम में ये ख्याल आया ,
   क्या ही अच्छा होता जो हम तलब किये जाते हशर में ,
   ना ये जिंदगी होती न हम बेआबरू होते भरे सदर में|
   जाते थे की याद आया, 
   कितनों को ले चले थे हम साथ इस सफ़र में |||

Friday, November 11, 2011

Dosti

|||आईने  की  दोस्ती  देखी,
जो देखा वो क़वायद से मुख्तलिफ तो ना था ,
ख्वाब जले थे मेरे और धुआँ उसकी आँखों में था |||



|||जिंदगी की शर्तों को निभाना इस क़दर आदत बन गयी 
की बेवफाई मोहब्बत का रस्म  
और दुश्मनी दोस्ती की क़वायद बन गयी |||