||| किसी की मय्यत तड़प रही है,
कोई शफीक-ए-खुदा हो रहा है|
किसी के हब में है शब् का आलम
कोई आफ़ताब-ए-जहाँ हो रहा है |
खबर बही जिंदगी के रुख का,
हमारी ज़ानिब ये क्या हो रहा है|||
||| बुतपरस्ती की जो हमने तमाम उम्र
कोई शफीक-ए-खुदा हो रहा है|
किसी के हब में है शब् का आलम
कोई आफ़ताब-ए-जहाँ हो रहा है |
खबर बही जिंदगी के रुख का,
हमारी ज़ानिब ये क्या हो रहा है|||
||| बुतपरस्ती की जो हमने तमाम उम्र
तो मिला हमको ये सिला
की उमर गुजर गयी ग़म काटते
और खुशियों की आमद पे हामिद खुद बुत बन गया|||
|||ग़म-ए-जिंदगी को भुलाने जो की हमने ज़ाम की सोह्बत,
चंद रिंद हमारे यार बने |
फिर महफ़िलें जमी, पीने के बहाने हज़ार बने|
रूखसत का लम्हा जो आया तो ये राज़ जाना,
नशा तो ग़म का ही था,
ये ज़ाम तो बस हल्फ को मददगार बने|||
|||मुफ़लिसी के आलम में ये ख्याल आया ,
क्या ही अच्छा होता जो हम तलब किये जाते हशर में ,
ना ये जिंदगी होती न हम बेआबरू होते भरे सदर में|
जाते थे की याद आया,
कितनों को ले चले थे हम साथ इस सफ़र में |||
Bahut Badhiya mere dost...
ReplyDeleteLoved totally ... ना ये जिंदगी होती न हम बेआबरू होते भरे सदर में|
AJeet
bahut khub likh raho ho Mishra ji...
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