जलते चिराग सा हो जाऊं, या की मशाल बन जाऊं,
बहुत दे चुके दूसरों की मिसाल,
अब तो लगता है, खुद ही बेमिसाल बन जाऊं।।
इंक़लाब की मशाल जाया हो जाती तो कोई बात न थी,
वो इंक़लाब तो न रहा, सियासी मौकापरस्त काबिज़ हो गए।
जो कमाई थी मैंने, वो उड़ाई तुमने,