Wednesday, September 23, 2020

 इंक़लाब की मशाल जाया हो जाती तो कोई बात न थी,

वो इंक़लाब तो न रहा, सियासी मौकापरस्त काबिज़ हो गए। 

जो कमाई थी मैंने, वो उड़ाई तुमने,

फर्माबरदार हो कर आये थे तुम, न जाने कब हाफिज हो गए।। 

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