Monday, October 6, 2014

|||नवाज़ीस होती ग़र आप हमसे रूठ जाते,
आपको मनाने के बहाने हम आपके और करीब आते|
यकीं तो है की दिल मे रहते हैं,
इस दफा हम आपकी साँसों मे बस जाते|||
|||मुश्तकबिल-ए-ज़िंदगी है फ़ना हो जाना |
अन्जाम-ए-इश्क़ है जुदा हो जाना |
जिंदगी की रवानी ठहेर भी जाए तो क्या ऐ आदम,
तू खुद ही अपनी रूह का रहनुमा हो जाना|||
|||बामुश्किल दिल लगाने का सिला ये मिला,
की बेमुशकिल जुदा हो गये|
इंतेहा वफ़ा की थी की बंदे से मोहब्बत की,
और वो ख़ुदा हो गये|
अब तो जीते हैं वादापरस्ती मे,
गोया तेरे खफा होने का लम्हा था की हम फ़ना हो गये|||
|||इल्म मेरे दर्द के शबब का, क्यूँ वहाँ नही है|
क्या मेरी सदाएँ नाकामिल हैं, या उन्हे वफ़ा नही है|
शैलाब चाहतों का बस इधर है, क्यूँ उधर हवा नही है|
क्या मुहब्बत खुदा नही, या खुदा वहाँ नही है|||
|||खूब सूरत, खूब सीरत
खूब अंदाज़ हैं आपके|
अपने अरमानों को पंख लगा लो ऐ नाज्निन,
अब तो हम उम्र तलक परवाज़ हैं आपके|||

|||मुमकिन है वाईज़ इश्‍क़ नहीं करते,
मुमकिन है ख़ुदा के दिल नहीं होता।
मुमकिन है ग़म-ए-मुहब्बत इन्सानी शह है,
या की ग़ैर मुमकिन है मुहब्बत कुफ़्र नहीं होती|||